शुक्रवार, 22 मार्च 2013

टीवी पत्रकारों पर दुनियां का सबसे बड़ा उंगलबाज.कॉम का सर्वेक्षण: ---उंगलबाज.कॉम

 उंगलबाज.कॉम ने तीन महीने के अथक परिश्रम के बाद होली के अवसर पर उस सर्वेक्षण को आपके सबके बीच लाने का निर्णय ले ही लिया है, जिसका इंतजार ब्रेकिंग और सिर्फ इसी चैनल पर टाइप पत्रकार कर रहे थे। दो सौ शहरो में ढाई सौ लोगों से बात करने के बाद यह सर्वेक्षण सामने आया है। इस सर्वेक्षण के परिणाम इतने चौंकाने वाले हैं कि आप इस पर विश्वास नहीं कर पाएंगे। आप कह सकते हैं कि सबकुछ पहले से फिक्स है। लेकिन जरा सोचिएगा यह कहने से पहले कि जिस देश में क्रिकेट मैच तक फिक्स हो सकता है, वहां एक सर्वेक्षण का फिक्स होना कौन सा नामुमकिन है।
 वैसे आरोप तो आप इस सर्वेक्षण पर पेड होने का भी लगा सकते हैं लेकिन जब खबरे पैसे लेकर छप सकती हैं तो सर्वेक्षण के परिणाम पैसे लेकर क्यों नहीं बदले जा सकते।
उंगलबाज.कॉम का यह सर्वेक्षण उस वक्त आप सबके सामने आया है, जब सारे टीवी चैनल और अखबार रिसेशन से बाहर आने की कोशिश कर रहे हैं। हमारे सर्वेक्षण में यह सामने आया है कि देश की सत्तर फीसदी आबादी को पता ही नहीं है कि एबीपी नाम से भी कोई चैनल है। यह सर्वेक्षण उंगलबाज.कॉम का, खबरिया चैनलों के ऊपर सबसे बड़ा सर्वेक्षण है। इस महा सर्वे के परिणाम वास्तव में बड़े चौंकाने वाले हैं। जिससे सहमत हो पाना बहुत मुश्किल है।

 इस सर्वेक्षण में हमें कई लोगों से मदद मिली। ब्रेकिंग प्राइवेट लिमिटेड और एक्सक्लूसिव फाउंडेशन ने खास तौर से आर्थिक मदद की। वे चाहते थे कि आने वाले दिनों में ऑन एयर होने वाले चैनल हाहाकार टीवी को अपने सर्वे में हम नंबर एक या नंबर दो की जगह दे दें। यह हमने किया भी है। हम उनमें नहीं हैं कि पैसे भी लें और काम भी ना करें। उंगलबाज.कॉम की विश्वनियता संदिग्ध है, लेकिन ईमानदारी पर कोई शक नहीं कर सकता। हमने जिससे पैसे लिए हैं, उनका काम करके दिया है। आप चाहें तो मार्केट में सर्वेक्षण करा सकते हैं, कहंी किसी तरह की शिकायत नहीं मिलेगी।
इस सर्वेक्षण में यह जानना चौंकाने वाला था कि सीएनबीसी आवाज को लोग आशुतोष और करण थापर से जोड़कर देख रहे है, इतना ही नहंीं इस सर्वेक्षण में हमें आजाद, एस वन, एमएच वन, प्रज्ञा, जैसे चैनल देखने वाले भी मिले।





इस सर्वेक्षण में हमने पाया कि देश की पचास फीसदी आबादी उन लोगों को पत्रकार मानने को तैयार नहीं, जिनका नाम राडिया कांड में नहीं था। एनडीटीवी में रविश और अभिज्ञान को इसीलिए बड़ा पत्रकार इस सर्वेक्षण में नहीं माना गया क्योंकि राडिया उनको नहीं जानतीे थी। इस सर्वेक्षण में बरखा दत्त, नीरा राडिया से अपनी जान पहचान की वजह से एनडीटीवी की सबसे बड़ी पत्रकार मानी गई। आज तक से प्रभू चावला के बलिदान को भी सर्वेक्षण ने बेकार नहीं जाने दिया। सर्वेक्षण में यह बात खुलकर सामने आई कि प्रभू को लाइफ टाइम अचिवमेन्ट अवार्ड देकर पत्रकारिता से सेवानिवृत हो जाना चाहिए।
सर्वेक्षण में सबसे आगे जी न्यूज रहा। सुधीर चौधरी जैसे होनहार पत्रकार की वजह से यह हो पाया। आम जनता की राय है कि सुधीर चौधरी ने साबित किया कि मीडिया को किसी नीरा राडिया की जरूरत नहीं है। जरूरत पड़ने पर मीडियाकर्मी आत्म निर्भर हो सकते हैं और कुछ भी कर सकते हैं। जी न्यूज छोड़ने की वजह से इस सर्वेक्षण में पूण्य प्रसून वाजपेयी का ग्राफ गिरा। उन्होंने उस समय चैनल छोड़ दिया, जब उसे वाजपेयी की सबसे अधिक जरूरत थी।
स्टिंग ऑपरेशन के लिए अनिरूद्ध बहल को जहां सबसे अधिक वोट मिले, वहीं खोजी पत्रकार के तौर पर सबसे आगे अरविन्द केजरीवाल रहे। रॉबर्ट वाड्रा, नितिन गडकरी, रिलायंस जैसे बड़ी खोज अरविन्द के हिस्से है। सर्वेक्षण में शामिल कुछ बड़े उद्योगपतियों ने कहा कि यदि अरविन्द पार्टी की जगह अपना चैनल खोलें तो वे उसमें पैसा लगा सकते हैं।
सर्वेक्षण में शामिल अस्सी फीसदी लोग कमर वाहिद नकवी और राहुल देव जैसे पत्रकारों का नाम नहीं जानते। अरविन्द मोहन को कुछ लोगों ने जरूर टीवी पत्रकार के तौर पर पहचाना और कुछ लोगांें का मानना यह भी है कि संजय झा को वेवसाइट संभालने की जगह कोई चैनल ही संभालना चाहिए।
सर्वेक्षण में शामिल एक भी व्यक्ति यह नहीं बता पाया कि एक बड़े पत्रकार पंकज पचौरी अचानक टीवी पर दिखना बंद क्यों हो गए। एक व्यक्ति का जवाब दिलचस्प था, इंडिया टीवी ने अभी तक उनकी तलाश क्यों नहीं की? क्या वह चैनल सिर्फ अभिनेत्रियों को ही ढूंढ़ता रहेगा? अपने बीच का एक पत्रकार नहीं मिल रहा, उसे क्यों नहीं तलाशते?
अंजना ओम कश्यप का नाम सत्तर फीसदी लोगों ने सुन रखा था लेकिन वह किस चैनल में हैं, यह बीस फीसदी लोग भी सही-सही नहीं बता पाए। दस फीसदी सर्वेक्षण में शामिल लोगों ने उनका नंबर हमारे सर्वेक्षणकर्ताओं से मांगा, जिसे हमारे सर्वेक्षण टीम के होनहार युवाओं ने खुबसूरती से टाल दिया।
सर्वेक्षण में शामिल पचपन फीसदी लोगों का मानना था कि रजत शर्मा अच्छे भले पत्रकार है, इंडिया टीवी में अपना कॅरियर क्यों खराब कर रहे हैं? टीआरपी सबकुछ नहीं होता। उन्हें आजतक या एनडीटीवी में होना चाहिए। वैसे दीपक चौरसिया को लेकर अब भी लोगों में भ्रम है कि वे इंडिया टीवी में गए हैं या फिर इंडिया न्यूज में। सुनने में आया है कि एक गुटखा कंपनी ने दीपक को ऑफर दिया है कि वे चैनल पर ऑन एयर उनकी कंपनी का गुटखा खाते हुए समाचार पढ़े तो गुटखा कंपनी उन्हें एक करोड़ रुपए साल का दे सकती है। (वैधानिक चेतावनीः गुटखा खाना सेहत के लिए अच्छा नहीं है।)
इस सर्वेक्षण को लेकर कुछ लोगों की आपत्ति हो सकती है लेकिन खबरिया चैनल वाले स्वर्ग का दरवाजा ढूंढ़ निकालते हैं और हम एक सर्वेक्षण भी नहीं कर सकते।
(हमारी विश्वनियता संदिग्ध है, बुरा ना मानों होली है)

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

गणतंत्र दिवस कवि सम्मेलन से लौटकर...

दिल्ली में जनवरी का महीना गणतंत्र दिवस कवि सम्मेलन का महीना होता है। हिन्दी कवि सम्मेलन, उर्दू कवि सम्मेलन, भोजपुरी-मैथिली कवि सम्मेलन, पंजाबी कवि सम्मेलन, किसी भी कवि सम्मेलन में चले जाइए, मंच की कविता के कद्रदानों की कमी नहीं मिलेगी, अच्छे कवि और अच्छी कविता की कमी महसूस हो सकती है।
कहते हैं जनवरी महीने में लाल किले में होने वाला कवि सम्मेलन देश का सबसे प्रतिष्ठित कवि सम्मेलन होता है और कभी इस कवि सम्मेलन को सुनने के लिए प्रधानमंत्री रहते हुए पंडित जवाहर लाल नेहरू पूरी-पूरी रात बैठते थे। यह बात दूसरी है कि अब इसी कवि सम्मेलन के लिए दिल्ली की मुख्यमंत्री तक के पास वक्त नहीं है। दिल्ली सरकार में शिक्षा मंत्री प्रो. किरण वालिया ने जरूर इस बार लाल किले पर बैठकर पूरी कविता सुनी और गिनकर सताइस बार कवियों का आभार भी स्वीकार किया। जिस तरह मंच पर अच्छे कवि दूर होते जा रहे हैं, आने वाले समय में यह भी कवियों के लिए किस्सा ही ना बन जाए कि दिल्ली सरकार की मंत्री पूरी रात बैठकर यहां कविता सुनती थीं।
इस बार गणतंत्र दिवस कवि सम्मेलन में मंच पर आया पहला कवि ही हरी ओम पंवार की फोटो कॉपि होने की कोशिश कर रहा था। फोटो कॉपि होने में कोई बुराई नहीं है। ओम प्रकाश आदित्य की  एक कवि कार्बन कॉपि हो रहे थे लेकिन दुर्घटना में हुई मृत्यु के बाद ओम प्रकाश आदित्य ंमंच पर नहीं आ सकते। उनकी नकल मंच पर सुनने वालों को आगे भी उनकी याद दिलाती रहेगी लेकिन सुरेन्द्र शर्मा और हरी ओम पंवार की कॉपि करने वालों को मंच पर बिठाने की क्या जरूरत है, जबकि यह दोनों कवि अकादमी को उपलब्ध हो सकते हैं और यह दोनों कवि मंचिय कवि समाज के लिए उपलब्धि भी हैं।
इस कवि सम्मेलन में नौशा खां, पवन जैन, नन्दलाल और सविता असीम को मानों हूट करवाने के लिए ही बुलवाया गया था, यदि यह चार नहीं होते तो जुगाड़ तंत्र से अंदर आए दीपक गुप्ता और कुछ कवियों का हाल यही होना था। वैसे कवि सम्मेलन में यह देखना दिलचस्प था, कि कई कवि जिन्हें सुनने वाले हूट कर रहे थे, वे इसे अपनी तारिफ समझ कर दुगुने उत्साह में दो कविता अधिक सुना कर जा रहे थे। वैसे भी मंच पर आगे वालों की ही सुनी जाती है, पिछे वालों की कौन सुनता है? उन्हें तो अनसुना भी किया जा सकता है।
दर्शको में इस बार कवि सम्मेलन को लेकर भारी निराशा थी, मदन मोहन समर ने इस निराशा से दर्शकों को निकाला। उन्होंने जब मंच से कहा कि मेरी कविता सतरह मीनट बारह सेकेन्ड की है तो कुछ लोगों ने इस बात को चुटकुला समझा और कुछ इस कविता को उबाउ समझकर कॉफी पीने चले गए लेकिन इस कविता ने लाल किले में ऐसा माहौल बनाया कि एक-एक श्रोता उनकी कविता पर झूम उठा। उन्होंने अपना वादा पूरा भी किया, सतरह मिनट कुछ सेेकेन्ड में अपनी कविता पूरी करके। यदि समर की वह कविता आपको पढ़ने को मिले तो आप उसे साधारण कविता की श्रेणी में भी ना रखें लेकिन मंच का समीकरण अलग होता है और उस समीकरण में समर का अंदाज ए बयां कुछ और। लोगों ने समर की कविता से अधिक उनके अंदाज ए बयां को सराहा। पसंद किया और झूमे। समर कवि सम्मेलन को जिस उंचाई पर ले गए थे, वहां से कवि सम्मेलन को बचाकर लाना बहुत बडी चुनौति होती है। इस चुनौति में मंच संचालक की परीक्षा होती है क्योंकि कवि सम्मेलन में मंच संचालक की भूमिका कप्तान की होती है। संचालक शशिकांत यादव जो संचालक जैसे भी थे लेकिन उन्होंने साबित किया कि वे एक अच्छे संयोजक और समन्वयक हैं। समर की कविता के बाद जिस खुबसूरती के साथ उन्होंने महेन्द्र अजनबी को मंच पर प्लेस किया, वास्तव में इसके लिए उनकी तारिफ की जानी चाहिए। मंच पर गिनती के नाम थे, जिन्हें सुना जा सकता था, आसकरण अटल, सीता सागर, वेद प्रकाश, कविता किरण, लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, विष्णु सक्सेना, अरूण जैमिनी। अशोक चक्रधर कोे मंचिय कवियों के बीच सुपर स्टार स्टेटस हासिल है। वे पिछले पचास सालों से लाल किले के कवि सम्मेलन में आ रहे हैं। अब वे सुनने वालों की शक्ल देखकर पहचान जाते हैं कि उस पर किस तरह की कविता काम करेगी।
लाल किले पर कुछ कवि सालों से आ रहे हैं, क्या वे लाल किले के लिए पूरे साल में एक नई कविता भी नहीं लिख सकते। जिस कविता ने उन्हें पहचान दिलाई है, वे डरते क्यों है कि नई कविता से वह पहचान छीन जाएगी। यह भी संभव है कि नई कविता उन्हें सुनने वालों के बीच फिर से एक नई पहचान दे। इसबार भी सालों से लाल किले पर  आ रहे अधिक कवियों ने अपनी पुरानी कविता ही सुनाई। कुछ लोगो ने जरूर मंच पर लिखी हुई और रास्ते में आते हुए लिखी हुई कविता सुनाई। सुनने वालों ने उन कविताओं को भी पसंद किया। फिर कवियों के मन में यह डर क्यों कि नई कविता सुनने वालों के बीच में जगह नहीं पाती। वैसे मंच पर लिखी हुई और रास्ते में लिखने की बात जिस कविता के लिए कही गई, उसे मंच पर प्रस्तुत करने की वजह वे चार नौजवान भी हो सकते हैं, जिन्होंने यह कहते हुए कवि सम्मेलन का बहिष्कार किया कि कविता के इस मंच से दामिनी को याद क्यों नहीं किया गया और वे चार नौजवान कवियों को धिक्कारते हुए कार्यक्रम से बाहर हो गए। कवि सम्मेलन में मौजूद श्रोताओं की माने तो यदि ये चार युवकों ने आयोजन का बहिष्कार नहीं किया होता तो कवि सम्मेलन का स्वरूप कुछ और होना था। वैसे अनुशासित तरिके से चल रहे कार्यक्रम में इस तरह बाधा डालना भी किसी सभ्य समाज की निशानी नहीं है। जिन युवकों ने विरोध किया, जिस तरह आनन-फानन में उन्होंने अपनी कार्यवायी को अंजाम दिया, उससे साफ पता चलता था कि उनका मकसद कविता सुनना नहीं था, वे अंदर आए ही थे, कवि सम्मेलन में बाधा बनने के लिए।
कविता किरण कविता सुनाने के दौरान श्रोताओं से बार-बार आग्रह कर रही थी, कि उन्हें शांत होकर कविता सुननी चाहिए। कई बार यह दोहराने के बाद उन्होंने मंच की तरफ मुखातिब होकर कहा- जब मंच पर ही लोग कविता नहीं सुन रहे और आपस मेे बात कर रहे हैं फिर मैं आप श्रोताओं से क्या कहूं?
मंच के कवि चाहते हैं कि उन्हें लोग गंभीरता से सुने तो कम से कम मंच पर उन्हें खुद दूसरे कवियों को सुनना होगा लेकिन दिल्ली के लाल किला कवि सम्मेलन को माहल्ले के कवि सम्मेलन से अधिक महत्व देने को कवि खुद तैयार नहीं थे। एक एक कर कवि कविता पढ़ रहे थे और अपना लिफाफा लेकर बाहर निकल रहे थे। क्या यह लाल किले के कवि सम्मेलन का अनुशाशन है। कवि कहते हैं कि यहां जवाहर लाल नेहरू सुबह तक कविता सुनते थे और आज कवि ही दूसरे कवि को सुनने को राजी नहीं है। दूसरे शहरों से आए कवियों की वजह से मंच की गरीमा थोड़ी बच गई, बेचारे इतनी ठंड में और इतनी रात को कहां जाते? वर्ना अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह की बारी-बारी आते पूरा मंच खाली हो जाना था।
इस साल मंच पर सुरेन्द्र शर्मा, हरिओम पंवार, राजगोपाल सिंह, दिनेश रघुवंशी, कुंवर बेचैन, कुमार विश्वास, शैलेश लोढ़ा की कमी लोगों ने मंच पर महसूस की। गणतंत्र दिवस कवि सम्मेलन में किसी मंत्री संतरी से पर्ची लेकर प्रवेश पाने वाले कवि पहले भी हुआ करते थे लेकिन अब ऐेसे कवियों की संख्या बढ़ सीगई है। अब मानों कवि की कविता अकादमी की प्राथमिकता में नहीं है, अकादमी के कवियों को बुलाने के मानक अब मानों बदल गए हैं।
इस बार गणतंत्र दिवस कवि सम्मेलन का ‘मैन ऑफ द सम्मेलन’ का खिताब देने की बात यदि हो तो निसंदेह वह मध्य प्रदेश के खाकी वर्दी वाले मदन मोहन समर को जाता है।
कवियों का नेता सबसे प्रिय विषय होता है, जहां वीर रस के कवि हमेशा पाकिस्तान के खून के प्यासे होते हैं, वहीं किसी रस का कवि हो, उसकी एक आध कविता नेताआंे पर निकल ही आएगी। ऐसे में पूरे कवि सम्मेलन में बैठे रहना दिल्ली सरकार में मंत्री किरण वालिया के लिए कितना मुश्किल रहा होगा, इसका अंदाजा कोई भी सहज ही लगा सकता है। कवि एक के बाद एक देश के नेताआंे की क्लास लेते रहे और पिछे नेताजी मुस्कुराती रहीं। यह अच्छा हुआ कि कविता में नेताओं से पूछे गए सवाल का जवाब देने के लिए बाद में संचालक शशिकांत ने मंत्रीजी को फिर से आमंत्रित नहीं किया।
यह मेरी बात थोड़ी काल्पनिक है, लेकिन इसे ंसभव किया जा सकता है।
क्या दिल्ली में उर्दू अकादमी और हिन्दी अकादमी मिलकर एक इंडियन कवि सम्मेलन-मुशायरा लीग जैसा कुछ नहीं कर सकती। दिल्ली के रामलीला मैदान मंे एक तरफ कवि सम्मेलन इलेवन के ग्यारह कवि और दूसरी तरफ मुशायरा इलेवन के ग्यारह शायर। एक तरफ सुरेन्द्र शर्मा या अशोक चक्रधर कप्तानी कर रहे हैं और दूसरी तरफ वसीम बरेलवी या मुनव्वर राणा ने कमान संभाली है। कवियों की तरफ से हरि ओम पंवार परफॉर्म करके लौटे और दूसरी तरफ मंच पर आने के लिए नवाज देवबंदी उतावले हुए जा रहे हैं। एक बार ऐसा एक प्रयोग करके देखिए फिर मैं देखा जाए कि कौन कहता है कि कविता और शायरी के कद्रदान कम हो गए हैं।

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

आशीष कुमार 'अंशु' की तीन कवितायेँ

                                                                          01
                                                                       -------
संपादकजी,
छापकर आवरण पर
नग्न स्त्रियों की तस्वीर
ललकारते हैं रात में
यही है तुम्हारी संस्कृति
देख लो खजुराहो

याद आते ही मनु स्मृति
कहते हैं
जला दो,
इसमें दलित विरोधी बातें लिखी हैं
दलित अधिकार, आदिवासी अधिकार में
शामिल नहीं है
दलित महिला, आदिवासी महिला,
का अधिकार,
यह जानते हैं हम
पर मानते नहीं।

स्त्री जो घर में छुपाई गई
बाजार में उघाड़ी गई
ना छुपना स्त्री की नियत थी,
ना उघड़ना उसकी मर्जी,
उसका छुपना पुरूष की इच्छा थी
और उघड़ना पुरूष की कुंठा।

                                                                        02
                                                                      --------
पत्नी को बेटी को सात पर्दों में रखा
और प्रेमिका के लिए स्त्री मुक्ति आन्दोलन
तुम दोगले हो और तुम्हारा आंदोलन खोखला
होना-खोना दर्जन भर औरतों के साथ
तुम्हारा पुरूषार्थ है
इसमें तुम्हारी स्त्री मुक्ति है, तुम्हारा स्त्री विमर्श है
यदि बेटी लिखे सोना दस मर्दों के साथ
बीवी लिखे पाना-खोना दर्जन भर मर्दों का हाथ
तुम्हारे पांव तले जमीन निकल जाएगी
हर आंदोलन की शुरूआत घर से क्यों नहीं
मुक्त करो बहनों को, बीवियों को, बेटियों को
अपने नजरों के चंगुल से
जातिय दंभ की तरह पुरूष होना भी दंभी  बनाता है
श्रेष्ठता का बोध कराता है
तुम भी तो पुरूष हो, दंभ और श्रेष्ठता से भरे हुए।

पहले अपने ‘पुरूष’ होने के झूठे दंभ से बाहर आओ
वर्ना स़्त्री मुक्ति की बात उस लोमड़ी की चालाकी है
जिसने भेड़ खाने के लिए भेड़ खाने का कानून बनाया
स्त्री मुक्ति के नाम पर स्त्री शोषण की राह तलाशते तुम
हे! महान साहित्यकार तुम्हारी स्त्री मुक्ति को प्रणाम।

                                                                 03
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बृहस्पतिवार, 20 दिसम्बर 2012

माओवादी दुनिया की पड़ताल .....


वर्ष 2008-09 की बात है, जब नेपाल में कुसहा बांध टूटने की वजह से बिहार में भयावह बाढ़ आई थी। बाढ़ के लगभग छह महीने बाद दिल्ली से पत्रकारों का एक समूह  बिहार-नेपाल के बाढ़ प्रभावित रहे क्षेत्र का दौरा करने के लिए गया था। उन में इन पंक्तियों का लेखक भी शामिल था। बिहार में सीतामढ़ी-सुपौल-सहरसा होते हुए नेपाल पहुंचे।
इसी यात्रा के दौरान एक माओवादी नेता से मुलाकात हुई। नेपाल में भारत की तरह माओवादी संगठन प्रतिबंधित नहीं हैं। इसलिए मिलने वाले सज्जन ने सार्वजनिक सभा में जब अपना परिचय माओवादी के रूप में दिया तो चौंकना लाजमी था। वैसे उस दौरान नेपाल में माओवादी शासन में थे।
वह व्यक्ति फिर यात्रा में हमारे साथ था।
शुभ्राशु चौधरी की किताब ''उसका नाम वासु नहीं'' पढ़ते हुए, उस यात्रा की याद आई। उस बातचीत को कहीं लिख नहीं पाया था। लेकिन शुभ्रांशु को पढ़ते हुए उस माओवादी नेता से हुई बातचीत की यादें ताजा हो गईं।
‘भारत में माओवाद से सहानुभूति रखने वाले जितने चेहरों को आप जानते हैं, उससे कई गुणा अधिक चेहरे छुपे हुए हैं। वे उस वक्त सामने आएंगे, जब भारत पर माओवाद का राज होगा।’
उस माओवादी नेता का यह अति आत्मविश्वास थोड़ा चौंकाने वाला था। मैंने धीरे से ही कहा- यह कभी संभव नहीं होगा।
जिस गाड़ी पर हम कुसहा के लिए जा रहे थे, उसमें वही हमारा मार्गदर्शक था। नेपाल में माओवादी सरकार थी। हम दूसरे देश में थे, इन सारी स्थितियों को समझते हुए, मेरे साथ बैठे एक पत्रकार ने आंखों के इशारे से कहा, बातचीत बंद कर दो। उस माओवादी नेता ने बिना असहज हुए कहा- आप निसंकोच कुछ भी पूछिए और आप सब पत्रकार हैं, मुझे हुई हर एक बात को ऑन द रिकॉर्ड समझिए। जहां चाहें इसे लिखें। फिर वे मेरी तरफ मुखितिब हुए- आपकी उम्र 24-25 साल की होगी, यकिन जानिए आप अपनी जिन्दगी में भारत में माओ का शासन देखंेगे। फिर बहुत से चेहरे बेनकाब होंगे।
उन्होंने पटना का एक किस्सा सुनाया, जब वे प्रचंड के साथ पटना हनुमान मंदिर में थे। पटना में प्रचंड की तलाश हो रही थी। इंटेलीजेन्स के पास खबर थी कि प्रचंड पटना में हैं। पटना हाई अलर्ट पर था। हर तरफ पुलिस थी और प्रचंड आसानी से उन सबके बीच से आम आदमी की तरह निकल गए, किसी ने पहचाना नहीं।
उन सज्जन ने बताया था, माओवादी अपनी टीम तीन श्रेणियों में बनाते हैं। एक वे लोग जो जंगल में रहते हैं और हथियार बंद रहते हैं। एक वे जो जंगल और बाहरी दुनिया के बीच समन्वय का काम करते हैं। आन्दोलन के लिए पैसा जुटाने का काम इनका ही होता है। वे सज्जन नेपाल माओवादी आन्दोलन में इसी भूमिका में थे और तीसरे वे लोग, जो समाज में पत्रकार, एनजीओ, अभिनेता, नेता, उद्योगपति या दूसरी भूमिका में होते हैं लेकिन उनकी सहानुभूति इस आन्दोलन के साथ होती है। आन्दोलन के लिए पैसा इन्ही लोगों के पास से आता है। उन सज्जन ने बताया कि नेपाल में माओवादी आन्दोलन की सफलता के लिए सबसे अधिक आर्थिक मदद भारत से मिलती है, इसलिए उन्हें अक्सर भारत आना पड़ता है। भारत में भी दिल्ली में सबसे अधिक मदद करने वाले हैं।
उन्होंने हथियार के संबंध में बताया था- माओवादी आन्दोलन में अधिकतर सस्ते हथियार इस्तेमाल होते हैं। उन्होंने कुकर बम का उदाहरण दिया। जिसमें पुराने कुकर को बम की तरह इस्तेमाल करते थे। एक समय तो इस वजह से भारत से कुकर का आयात भी नेपाल ने बंद कर दिया था। इसी तरह तीन बार झूठा बम रखकर, जब नेपाल पुलिस बम को लेकर लापरवाह हो जाते थे तो जिन्दा बम रखने की जानकारी उन्होंने दी। यह सब घटना नेपाल में माओवादी शासन आनंे के पहले की है।
चीन के हथियार नेपाल में माओवादियों के पास कैसंे आते हैं, क्या चीन उन्हें मदद कर रहा है? इस सवाल पर उन माओवादी नेता ने यही बताया था कि चीन उनका चोरी-छीपे जाना-आना रहा है। वहां के कई हथियार के सौदागरों से उनका परिचय है लेकिन वे आन्दोलन के लिए सारे हथियार खरीद कर लाते हैं, चीन कोई भी हथियार खैरात में नहीं देता। इसके लिए उन्हें पैसा भारतीय मददगारों से चंदा के तौर पर मिलता है।
यदि मैं सही-सही याद कर पा रहा हूं तो उस दौरान उन सज्जन के छोटे भाई की पत्नी प्रचंड सरकार में किसी महत्वपूर्ण भूमिका में थी। छोटे भाई भी सक्रिय राजनीति में थे।
आज शुभ्रांशु चौधरी की किताब पढ़ते हुए लगा, वासु के तौर पर वही नेपाली माओवादी मेरे सामने आ खड़ा हुआ हो।


बुधवार, 28 नवम्बर 2012

शेर का राज माने जंगल राज!

तुम कहते हो वह शेर था,
फिर पिंजरे में क्यों रहता था?
इतनी सुरक्षा में क्यों चलता था
और वह शेर था
तो तुम्हे मानना चाहिए, तुम्हारे राज्य में जंगल-राज है.

कमाल है तुम यह भी मानने को तैयार नहीं
और बात-बात पर
गिरफ्तार कराने को उतावले रहते हो!

मंगलवार, 27 नवम्बर 2012

दो नहीं साढे चार हजार ....



प्रतिभा पाटिल और जोस मुजीका में वैसे तुलना जैसी कोई बात नहीं है, लेकिन पिछले दिनों भारत की पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने जब पूणे में बन रहे दो हजार वर्ग फीट के बंगले को अपने लिए छोटा बताया और जब उन्होंने खुद अपनेे लिए साढे चार हजार वर्ग फीट के बंगले की मांग की तो भारतीय शाशन को समझने वालों के लिए यह बात बिल्कुुल असहज करने वाली नहीं थी। लेकिन एक सवाल जरूर एक बार पूर्व राष्ट्रपति से देश जानना चाहेगा कि क्या वे इस देश की गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण से परिचित हैं? राष्ट्रपति का अपना किरदार इतना ऊंचा होना चाहिए कि आम आदमी उससे प्रेरणा हासिल करे लेकिन यदि राष्ट्रपति जैसे ऊंचे पद पर बैठे लोग दो हजार वर्ग फीट की जमीन को अपने लिए अपर्याप्त बताएंगे तो इससे देश के आम आदमी के बीच क्या संदेश जाएगा?



वैसे यहां नेता निजी सुरक्षा के नाम पर जब करोडो रूपए लूटा सकते हैं तो फिर एक पूर्व राष्ट्रपति की इस छोटी सी मांग पर सवाल उठाने का सीधा सा अर्थ है, सवाल पूछने वाले की मंशा ठीक नहीं है। इसलिए अन्ना और केजरीवाल ने भी इस मसले को व्यक्तिगत समझकर कुछ भी बोलना ठीक नहीं समझा। ना मीडिया को यह जरूरी विषय लगता हैै। लेकिन जिस काम में देश का पैसा लगाया जाने वाला हो, वह व्यक्तिगत कैसे हो सकता है?
यहां प्रतिभा पाटिल के साथ जोस मुजीका को याद करना महज संयोग नहीं है। जोस जैसा व्यक्तित्व होता ही इसीलिए है कि दूसरों को प्रेरित कर सके। अपनी पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से भी देश की यही अपेक्षा है कि उनका जीवन दूसरों को प्रेरित करे। खैर, जोस की कहानी से पहले, खबर लिखे जाने तक प्रतिभा पाटिल के साढे चार हजार वर्ग फीट के बंगले की मांग गृह मंत्रालय ने मान ली है और शहरी विकास मंत्रालय से इस दिशा में कदम उठाने की अनुशंसा भी कर दी गई है।
भारत भूमि, जिसको त्याग और बलिदान की भूमि कहा जाता है लेकिन समय के साथ अब इस धरती का किरदार भी बदल रहा है।


जोस मुजीका और प्रतिभा पाटिल में तुलना वाली कोई बात तो नहीं हैं लेकिन, कह सकते हैं कि जोस उरूग्वे के वर्तमान राष्टपति हैं और प्रतिभा पाटिल भारत की पूर्व राष्ट्रपति हैं। यह भी जोर सकते हैं कि प्रतिभा पाटिल जिस देश से आती हैं, वह खुद को त्याग और बलिदान का देश कहता हैं, वहां कुपोषण से प्रत्येक साल हजारों बच्चे असमय मौत के मुंह में चले जाते हैं। वहां की तय गरीबी रेखा इतनी कम है कि तय करने वालों को भी बाद में मुंह छुपाना पड़ा और खास बात यह कि वहां की राष्ट्रपति के छह लोगों का परिवार दो हजार वर्ग फीट के बंगले मंे जीवन-यापन  नहीं कर पाएगा,  ऐसा राष्ट्रपति खुद मानती हैं।
उरूग्वे जो एक बहुत ही छोटा देश है, वहां राष्ट्रपति का पद सफेद हाथी की तरह नहीं होता, वहां राष्ट्रपति, राष्टप्रमुख होता है। जोस मुजीका का जिक्र इसलिए यहां प्रासंगिक है क्योंकि क्यूबा क्रांति से निकले छोटे से देश उरूग्वे के इस राष्ट्रपति ने अपने देश में राष्ट्रपति को मिलने वाली सारी सुविधाएं त्याग दीं। वे सरकारी आलीशान बंगले को छोडकर पत्नी के साथ छोटे से फार्म हाउस मंे रहने चले गए। यह फार्म हाउस उरूग्वे की राजधानी मोनतेविडियो के पास है। उनका वेतन 14 हजार डॉलर के आस-पास है, जिसका नब्बे फीसदी हिस्सा वे दान कर देते हैं। इस दान की बडी रकम वे जरूरतमंद छोटे कारोबारियों को देते हैं। वे सुरक्षा के नाम पर बड़ा तामझाम नहीं रखते और ना ही काफीला लेकर चलना पसंद करते हैं। निजी सुरक्षा के नाम पर उन्होंने सिर्फ दो निजी गार्ड रखा हुआ है। भारत की पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल कोे एक बार जोस मुजीका से मिलना चाहिए। हो सकता है, मिलकर पूर्व राष्ट्रपति कुछ सीखंे और इस देश के लिए भी वे एक आदर्श साबित हों।

शुक्रवार, 28 सितम्बर 2012

अस्मिता से जुड़ते भाषा के सवाल


 धूमिल की एक कविता है, ‘जो असली कसाई है, उसकी निगाह में तुम्हारा यह तमिल दुख, मेरी भोजपुरी पीड़ा का भाई है। भाषा उस तिकड़मी दरिन्दे का कौर है, जो सड़क पर और है, संसद में और है।’
भाषा को लेकर होने वाली बहस सामाजिक भी है और राजनीतिक भी। इस बात में अब विमर्श की गुंजाइश नजर नहीं आती लेकिन भाषा का प्रश्न महत्वपूर्ण है, इसके महत्व को हमें स्वीकारना होगा। यूनेस्को की माने तो दुनिया भर में बोली जाने वाली 6900 भाषाओं में पचास फीसदी भाषाएं खतरे में हैं, और एक अनुमान के अनुसार प्रत्येक दो सप्ताह में एक भाषा औसतन खत्म हो रही है। मात्र अस्सी भाषाएं हैं, जैसे अंग्रेजी, हिन्दी, मंडेरिन, रसियन जिसे विश्व भर के अस्सी प्रतिशत लोग बोल रहे हैं। दुनिया भर में 96 प्रतिशत भाषाआंे को सिर्फ चार फीसदी लोग बोल रहे हैं और 90 प्रतिशत भाषाओं का प्रतिनिधित्व इंटरनेट पर मौजूद नहीं है।
आज से लगभग अस्सी साल पहले भारत मंे एक भाषायी सर्वेक्षण सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने किया था। आज भी भाषायी सर्वेक्षण पर जब बात आती है तो लोग संदर्भ के तौर पर ग्रियर्सन को ही उद्धृत करते हैं। ग्रियर्सन के बाद देश में भाषा को लेकर उस तरह का कोई दूसरा सर्वेक्षण नजर नहीं आता।
अब पिछले ढाई-तीन सालों से बिना किसी सरकारी मदद के और बिना किसी विदेशी मदद के देश भर में भारतीय जन भाषा सर्वेक्षण का काम नागरिक समाज की तरफ से हो रहा है। इसी जन भाषा सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट बताती है कि देश मंे तीन सौ से अधिक भाषाएं लापता हैं। इन्हें बोलने वाले कहां हैं, इसकी जानकारी सर्वेक्षण टीम को नहीं मिल पाई है। भाषा सर्वेक्षण का काम जारी है, आने वाले समय में हो सकता है, इस सर्वेक्षण से और भी चौकाने वाले तथ्य सामने आएं।
21-22-23 सितम्बर को दिल्ली में जनभाषा सर्वेक्षण के नेशनल कलेक्टिव में जैसे-जैसे सवाल एक के बाद एक विमर्श के लिए सामने आए, भाषा को लेकर समाज की संवेदना और लगाव की बात भी स्पष्ट होती गई। यह ‘जन भाषा सर्वेक्षण’ का अंतिम ‘नेशनल एडिटोरियल कलेक्टिव’ था। देश भर के अलग-अलग राज्यों से भाषा सर्वेक्षण के संयोजक इस आयोजन में शामिल होने के लिए दिल्ली आए थे।  अंतिम चरण की तरफ बढ़ रहे भाषा सर्वेक्षण की एक रूप रेखा उम्मीद है कि अगले साल अंतरराष्ट्रीय भाषा दिवस के अवसर पर 21 फरवरी तक सामने आ जाएगी।
भारतीय जन भाषा सर्वेक्षण की तरफ से डा. जी एन देवी ने विश्वास दिलाया, ‘21 फरवरी को हम यह घोषणा कर देंगे कि बच्चे का जन्म हो गया है। भारतीय जन भाषा सर्वेक्षण की एक रूप रेखा हमारे सामने उस वक्त तक आ जाएगी।’
भारतीय जन भाषा सर्वेक्षण पिछले ढाई-तीन सालों में लगे 3500 लोगों के श्रम का नाम है, जिन्होंने 68 वर्कशॉप से 631 भाषा/बोली पर काम पूरा किया। इन भाषाओं पर अब तक लगभग 9500 पृष्ठ लिखा गया है और अभी देश भर के भाषा प्रतिनिधि अपने-अपने राज्य के सर्वेक्षण को पूरा करने में और लिखने का काम पूरा करने में लगे हुए हैं।
631 प्रविष्टियों में एक प्रविष्टि को जन भाषा सर्वेक्षण ने अब मंजूरी दी है, यह भाषा उन पचास लाख लोगों की भाषा है, जो खुद को बोलकर अभिव्यक्त नहीं करते। वे संकेत के माध्यम से खुद को अभिव्यक्त करते है। उनके लिए अभिव्यक्ति माध्यम संकेत है। इस भाषा का इस्तेमाल देश भर के बोल और सुन ना पाने वाले करते हैं।


तीन दिन की बातचीत में एक-एक करके कई मुद्दों पर चर्चा हुई। बंगाल से आए मित्रों ने बेदिया समाज की भाषा की बात की, जिन्होंने अपनी भाषा को गुप्त भाषा के तौर पर इस्तेमाल किया और आज भी बेदिया समाज के लोग अपनी भाषा के संबंध में अधिक बात नहीं करना चाहते, इसलिए उनके समाज के बाहर के लोगों को इस भाषा के संबंध में अधिक जानकारी नहीं है। बंगाल की बेदिया समाज की भाषा अकेली ऐसी भाषा नहीं है, इस देश में दर्जनों ऐसी भाषाएं हैं, जिनकी लिपी और साहित्य के संबंध में कोेई जानकारी नहीं मिलती। अंग्रेजों ने कई जातियों को अपराधी जाति घोषित किया था, अंग्रेजों से बचने के लिए कई अपराधी कही जाने वाली जातियों ने अपनी गुप्त बोली ईजाद की, अंग्रेज चले गए लेकिन वे बोलियां आज भी समाज के बाहर के लोगों के लिए गुप्त ही हैं।
भाषा और बोली का मामला बेहद संवेदनशील है, कोंकणी को लेकर लिपी की लड़ाई है। कुछ इसे रोमन में लिखना चाहते हैं और कुछ देवनागरी के तरफदार हैं। इसी प्रकार कई बोलियों को मिलाकर इस्तेमाल की जा रही राजस्थानी बोली को लेकर राजस्थान में कुछ लोग संघर्ष कर रहे हैं।
दूसरी तरफ दस हजार से कम बोली जाने वाली बोलियों का कोई रिकॉर्ड सरकारी फाइलों में भी दर्ज नहीं होता। बड़ी संख्या में भाषाएं खत्म हुई और किसी को कानों कान खबर भी नहीं हुई।
ऐसे समय में जन भाषा सर्वेक्षण की यह पहल, भाषाओं और बोलियों को पहचानने और उनकी पहचान को और पुख्ता करने का ही काम कर रही है।




आशीष कुमार 'अंशु'

आशीष कुमार 'अंशु'
वंदे मातरम